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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

शान्ताशेषविशेषणो विगतभीः संत्यक्तसर्वैषणो गत्वानूनमकिंचनत्वमरिषु त्यक्त्वा समग्रां श्रियम् । शान्ताहंकृतिरस्तदेहकलनस्तेष्वेव भिक्षामट न्मामप्युज्झितवानलं यदिभवस्युच्चैस्त्वमुच्चैरसि ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वत्याग ही अवश्य कर्तव्य है, इसलिए उसीका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करते हैं। हे राजन्‌, यदि तुम्हारे छत्र, चामर आदि समस्त राजचिह निवृत्त हो गये हैं, यदि तुम लज्जा के भय से निर्मुक्त हो गये हो, यदि तुमने समस्त धनादि की इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, यदि तुम अकिंचन भाव को प्राप्तकर और शत्रुओं के लिए ही सर्वविध एश्वर्य का परित्याग कर अहम्भाव से निवृत्त हो गये हो, यदि तुम अपने देह के अभिमान से रहित होकर उन सब शत्रुओं में ही भिक्षार्थं अटन कर रहे हो, यदि परिपूर्णभाव की प्राप्ति के कारण मुझ गुरु को भी प्रश्नों से छुटकारा दे रहे हो, तो तुम समस्त मुमुक्षुगणों से ऊँचे होकर सर्वोपरि ब्रह्मस्वरूप मुक्त ही हो । अब फिर तुम्हारे लिए संसार की संभावना कभी हो ही नहीं सकती