Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 61
14 verse-groups
- Verses 1–2में तो वह स्वप्न के सदश भ्रान्ति नहीं भासती, किन्तु दतर सत्यरूप ही भासती है । भगवन्, एक…
- Verses 3–5विरकालानुवृक्ति का बाध न होना ही सत्यता-भ्रम की दृढता में हेतु है, न कि बाधित विरकालानुवृ…
- Verse 6शंका हो कि तब प्रजापतियो को तत्त्वज्ञान से स्वयं कल्पित प्रपंच की शीघ्र विनाशिता का अनुभव…
- Verse 7श्रीरामजी, इस शयनस्थ पुरुष को अनुभूयमान यह प्रसिद्ध हम, तुम आदि समस्त जीव जगत्-स्वरूप स्…
- Verse 8माना कि प्रजापति का समष्टि स्वप्न भी वैसा ही है, उससे प्रकृत मेँ क्या आया ? इस पर कहते है…
- Verses 9–10ऐसा ही सही, उससे भी प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते हैँ । श्रीरामजी, असत्यभूत मनःकल्पित स…
- Verse 11हम लोगों को भी स्वप्न में जिस सृष्टि का भान होता हे, उसमें उस समय दृढ़रूपता का ही भान होत…
- Verse 12प्रजापति की नाई सबको अपने-अपने स्वप्नो मे उस समय दीर्घ-प्रपंचता का भान होता ही है, यह कहत…
- Verse 13जिसकी प्रसिद्धि चिति के ही अधीन है, ऐसा दृृश्यत्व मिथ्यात्व में ही प्रयोजक है, वह दृश्यत्…
- Verse 14श्रीरामजी, जब यह सृष्टिशोभा स्वप्नस्वरूप ही है, तत्त्वतः सत्यरूप नहीं है; तब सर्गादि के स…
- Verse 15जब ये सम्पूर्ण पदार्थ अत्यन्त असत् ही हैं तो व्यवहार योग्य कैसे हुए ? ऐसी यदि आशंका हो,…
- Verse 16अज्ञान की (अविद्या की) अघटित घटना में सामर्थ्य होने से भी शंका का अवसर नहीं है, यह कहते ह…
- Verses 17–27जगत् में असंभावित अनेक पदार्थो का दर्शन दृष्टान्तरूप से बतलाते हैं। श्रीरामजी, (जगत् मे…
- Verses 28–31एवं ब्रह्मरूप से देखने पर असत्य कुछ भी नहीं है ओर जगद्रूप से देखने पर तो कुछ भी सत्य नहीं…