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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । यथास्माकं मुने स्वप्नपुरपत्तनमण्डलम् । तथैव पद्मजादीनां यदि देहपरिग्रहः ॥ १ ॥ तथैवेदं च संजातं यदि सर्वमसन्मयम् । तदस्माकं दृढतरः प्रत्ययः कथमुत्थितः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

में तो वह स्वप्न के सदश भ्रान्ति नहीं भासती, किन्तु दतर सत्यरूप ही भासती है । भगवन्‌, एक ही पदार्थ का इस प्रकार विषमता से भान होने मे क्या कारण है ? यदि इस पर कहें कि दीर्घकाल से वले आने के कारण हम लोगों को सत्यरूप और दृढ़तर अनुभूत होती है, तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि फिर तो ब्रह्मा आदि को, जिनकी आयु दो परा्धवर्ष की है, हम लोगों की अपेक्षा संसारकी विरकालतक अनुवृत्ति होने से उसमें (जगत्‌ मे) सत्यता एवं दृढ़ता की ओर भी अधिकता होने लगेगी, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैँ । हे मुने, जैसे हम लोगों की दृष्टि में स्वप्नकालीन नगर, राजधानी एवं देश भ्रान्तिरूप हैं; वैसे ही यदि हिरण्यगर्भ आदि की दृष्टि में देहधारण और उसी प्रकार उत्पन्न हुआ यह समस्त जगत्‌ असद्रूप भ्रान्ति ही है, तो हम लोगों को ही इस प्रपंच में दृढ़तर सत्यत्वबुद्धि क्यों होती है और उन्हें (हिरण्यगर्भ आदि को) दृढ़तर सत्यत्ववुद्धि क्यों नहीं होती ?