Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
भवत्यात्मनि सर्गादि दृढप्रत्ययमेव तत् ।
निमेषमात्रः पौरोऽयं सर्गस्वप्नः पुरः स्थितः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हम लोगों को भी स्वप्न में जिस सृष्टि का भान होता हे, उसमें उस समय
दृढ़रूपता का ही भान होता है अर्थात् उस समय उसमें मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती, इसलिए उसकी
सत्यता नहीं मानी जाती । ठीक वैसी ही स्थिति हिरण्यगर्भ के समष्टिस्वप्नरूप सृष्टि की भी जानिए।
प्रजापति सम्बन्धी सृष्टि की दीर्घकालस्थिति स्वीकारकर यह सब कहा गया है, वस्तुतः उसकी दीर्घता
भी हरिश्चन्द्र के स्वप्न की दीर्घता की नाई (73) थोडे समय तक भी हो सकती हे, यह कहते हें । वस्तुतः
वर्षाकालीन जलप्रवाह की नाई निमेषमात्र के लिए ही प्रजापति का यह सूृष्टिस्वप्न सामने स्थित हे ओर
निमेषमात्रस्वरूप ही इस स्वप्न में कल्परूपता की केवल कल्पना की गयी हे