Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
न हि पर्यनुयोक्तव्याः स्वप्नविभ्रमरीतयः ।
न तदस्ति जगत्यस्मिन्यन्न संभवति भ्रमे ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान की (अविद्या की) अघटित घटना में सामर्थ्य होने से भी शंका का अवसर नहीं है, यह
कहते है ।
(अविद्या के अघटित घटना में समर्थ होने के कारण) इस जगत् में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसका
(00) राजा हरिश्चन्द्र को रात्रि में जो स्वप्न दीख पड़ा, वह उसे ऐसा प्रतिभासित हुआ कि मानों
मैंने १२ वर्ष तक स्वप्न देखा हो-ऐसा पुराणों में प्रसिद्ध है ।
भ्रम में संभव न हो। इस त्रिभुवन में चित्र-विचित्र आश्चर्यजनक वस्तुकी सृष्टियाँ दीख पड़ती है