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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verses 3–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 3-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्मत्सर्गवदाभाति पूर्वसर्गः प्रजापतेः । आजीवप्रतिभासात्मा विद्यते न तु वास्तवः ॥ ३ ॥ सर्वगत्वाच्चितेः सर्वं जीवः सर्वत्र संसृतिः । सा चासम्यग्दर्शनोत्था सम्यग्दर्शननाशिनी ॥ ४ ॥ स्वप्नाभः प्रतिभासोऽस्य य एष समुपस्थितः । अहंताप्रत्ययैकात्मा स एवातिदृढं स्थितः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

विरकालानुवृक्ति का बाध न होना ही सत्यता-भ्रम की दृढता में हेतु है, न कि बाधित विरकालानुवृत्ति, इस आशय से महाराज वसिष्ठजी समाधान करते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, (जब यह ब्रह्मदेव पहले कभी उपासना कर रहे थे तब उन्हें तत्त्वज्ञान न रहने से) उनकी (प्रजापति की) उस समय की प्रथम सृष्टि, आज हम लोगों द्वारा अनुभूयमान सृष्टि के समान, यद्यपि चारों ओर से चार प्रकार भूत-समूहरूप जीवों के प्रतिभासस्वरूप हुई सत्य ही भासती थी; तथापि आज उसके तत्त्वज्ञान से बाधित हो जाने के कारण वह अपनी कुछ भी सत्यता (सद्रूपता) नहीं रखती । जब तक अज्ञान है तब तक चिति के सर्वव्यापी होने से जीव भी सर्वरूप होता है ओर सर्वत्र संसार भी सत्य-सा होता है; क्योकि वह संसृति तत्त्वज्ञान के विरोधी अज्ञान से उत्पन्न होती है ओर तत्त्वज्ञान से नष्ट होती हे । इसलिए हिरण्यगर्भ को यह जो तत्त्वज्ञान से बाधित, स्वप्नतुल्य यानी सुंदर प्रपंच का प्रतिभास उत्पन्न होता है; वही अज्ञानी हम लोगों को अहंता-बुद्धि से एकरूप होता हुआ अत्यन्त दृढ़ होकर स्थित हे