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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

तदा संभवतीदं वै तत्पदं प्रलयं गतम् । यद्यथा यादृशं दृष्टं तत्तादृग्विद्यते तथा ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जब ये सम्पूर्ण पदार्थ अत्यन्त असत्‌ ही हैं तो व्यवहार योग्य कैसे हुए ? ऐसी यदि आशंका हो, तो उसका- वैसा अनुभव होने से ही यो समाधान है; अतः यहाँ कुछ प्रष्टव्य (शंका करने योग्य) ही नहीं है, यह कहते है। इस संसार में जो वस्तु जिस प्रकार से जैसी देखी गयी है, वह उस प्रकार से वैसी ही विद्यमान हे । अतः स्वप्न-भ्रम की रीतियों में किसी भी प्रकार की शंका-कुशंका न करनी चाहिए