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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 23

बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग जिन दोषों का परित्याग कर देने पर मनुष्य को मृत्यु बाधा नहीं पहुँचाती, उन दोषों का तथा मन को जिसमें लगाना चाहिए - उसका वर्णन ।

32 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबाहो श्रीरामजी, तदनन्तर कल्पलता के अग्रभाग मेँ आसीन उस वाय…
  2. Verse 2हे पक्षियों के श्रेष्ठ राजा, जगत-कोश में विचरण कर रहे ओर व्यवहार कर रहे भी प्राणियों की द…
  3. Verse 3भुशुण्ड ने कहा : हे सर्ववित्‌ ब्रह्मन्‌, आप यद्यपि सब कुछ जानते हैं, तथापि जो मुझसे, जिज्…
  4. Verse 4यद्यपि वैसी स्थिति है, तथापि आज जो मुझसे पूछते हैं, उसका आपको मैं उत्तर देता हूँ, क्योकि…
  5. Verse 5उसमें समस्त दोषों की आश्रय वासना का विनाश ही मृत्यु पर विजय पाने के लिए मुख्य उपाय है, ऐस…
  6. Verse 6ब्रह्मन्‌, देह-वृक्ष का उच्छेद कर देनेवाले निःश्वासरूपी करवत जिनसे उत्पन्न होते हैं तथा स…
  7. Verse 7ब्रह्मन्‌, शरीररूपी वृक्ष के कोटर में रहनेवाले सर्पो के समूहरूप तथा चिन्तारूपी फणविस्तारो…
  8. Verse 8राग -द्रेषरूपी विष से परिपूर्ण अपने मनरूपी बिल में रहनेवाला लोभरूपी सर्प जिसको दंश नहीं क…
  9. Verse 9शरीररूपी समुद्र का वडवाग्निरूप अतएव समस्त विवेकरूपी जल को पी जानेवाला क्रोध जिसको दग्ध नह…
  10. Verse 10महाराज, तिलो की बड़ी राशि को व्यग्र कर देनेवाले कठिन कोल्हू यन्त्र की नाई उग्रतापूर्वक अन…
  11. Verse 11ब्रह्मात्मा में विश्रान्ति ही आत्यन्तिक मृत्यु-विजय में हेतु है, ऐसा कहते है । जिसने एक न…
  12. Verse 12शरीररूपी पुष्पित अरण्य प्रदेश में प्रवेश कर दौड-धूप मचानेवाला बलवान जिसका मन, वानर की नाई…
  13. Verse 13दोषों का उपसंहार कर रहे भशुण्डजी-मूत्यु विजय में हेतुभूत गुणों का उपक्रम करने के पहले समा…
  14. Verse 14शारीरिक एवं मानसिक पीडाओं से जनित तथा महान विभ्रमो से (पुत्र, कलत्र आदि विषम-व्यामोहों से…
  15. Verse 15जिस महापुरुष का चित्त समाहित है, उसका चित्त न अस्त होता हे, न उदित होता हे, न उसमें स्मृत…
  16. Verse 16जिस महात्मा का चित्त समाहित है, उसकी काम क्रोध आदि विकारों से उत्पन्न तथा हृदयाकाश को आवृ…
  17. Verse 17जिसका चित्त समाहित है, शास्त्रानुसारी व्यवहारों को चलाता हुआ भी वह परमार्थतः न कुछ देता ह…
  18. Verse 18जिस महापुरुष का चित्त समाहित है, उसे उपार्जन करने योग्य अनेक दुष्ट धनादि अर्थ; कृषि,गृह आ…
  19. Verse 19जिसका चित्त समाहित है, उसकी ओर अनेकविध अर्थो से युक्त एवं विविध गुणों से परिपूर्ण, निरतिश…
  20. Verse 20महाराज वसिष्ठजी, (चूँकि समाहित चित्त को किसी प्रकार के गुण-दोष अस्त- व्यस्त नहीं कर पाते,…
  21. Verse 21महाराज, चित्त को पुरुषार्थशून्य बनानेवाले, अपवित्र, द्वैत-दर्शनरूप पिशाचके द्वारा जो तत्त…
  22. Verse 22अनादिकाल से सबसे बढ़-चढ़कर जिसका औचित्य सिद्ध हो चुका है, तथा जो आरम्भ में सुन्दर, मध्य म…
  23. Verse 23जो अविनाशी है, मन के लिए सदा हितकर है, अबाधितस्वरूप है, आदि मध्य एंव अन्त-इन सभी अवस्थाओं…
  24. Verse 24ब्रह्मर्षे, जो बुद्धि से परे हे, प्रकाशस्वरूप है, सबका आदि कारण है, निरतिशय अमृतस्वरूप है…
  25. Verses 25–26अब परम तत्त्व में सबसे बढ़-चढ़कर सौभाग्यरूपता है, इसका दूसरे सुखो में अनित्यत्व-प्रतिपादन…
  26. Verse 27हे प्रीतिपात्र, वृक्षों से राजित, राजा-महाराजाओं से युक्त; पर्वत, नगर एवं व्रजभूमि से शोभ…
  27. Verse 28योंतीनों लोकों की अशुभरूपता बतलाकर उसके अन्दर के जगत की भी अशुभरूपता बतलाते हैं । महाराज,…
  28. Verse 29आधि (मानसिक व्यथा) एवं व्याधि से अत्यन्त चपल तथा दुख:समूह से परिवेष्टित सर्वदा तुच्छ क्रि…
  29. Verse 30जिन्होंने चित्त तरल कर दिया है तथा जो मन में आनन्द देते हैं, ऐसे बुद्धि के विकारभूत मानसक…
  30. Verses 31–32मनरूपी क्षीर-सागर के मंथन में मन्दराचल का आचरण करनेवाले अपने संकल्प, विकल्प आदि मानसिक व्…
  31. Verses 33–35निरन्तर उत्पन्न एवं विनष्ट होनेवाली, अत्यन्त अद्भुत, तलवार की धार के सदृश इन्द्रिय आदि की…
  32. Verse 36दुरूह ओर विस्तृत होने के कारण मन को व्यग्र बनानेवाली चौदह प्रकार की विद्याओं का विचार (नि…