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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

इति विविधजगत्क्रमाः समस्ताः खलु मतिमूढतया नरस्य रम्याः । चलतरकलनाहिते पदार्थे कथमुपयान्ति चिरस्थितिं महान्तः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

दुरूह ओर विस्तृत होने के कारण मन को व्यग्र बनानेवाली चौदह प्रकार की विद्याओं का विचार (निष्कर्षं निकालने में समर्थतारूप पाण्डित्य) भी श्रेष्ठ नहीं है, दूसरों के कार्यो का बुद्धिसौष्ठव से विचार कर विवेचन करने की सामर्थ्य (लोकानुरंजनसामर्थ्य) भी श्रेष्ठ नहीं है, तथा सर्वश्रेष्ठ महाभारत आदि के कथाक्रमों का भली प्रकार वर्णन करने की सामर्थ्य भी श्रेष्ठ नहीं है, क्योकि जहाँ विवेकी पुरुषों का मन पूर्णकाम होकर विश्रान्ति पाता है, वैसा वहाँ कुछ भी तात्विकरूप वस्तु नहीं है ॥३ ४॥ आधि-व्याधियों से प्रचुर चिरजीविता भी श्रेष्ठ नहीं है; समस्त व्याधियों का विनाशरूप मरण, अखिल दुःखों की निदान दृढ़ अज्ञतारूप होने से, भी श्रेष्ठ नहीं है । (तो भोग द्वारा सभी दुःखों का विनाशक होने से नरक ही श्रेष्ठ है ?“ इस शंका पर कहते हैं ।) महाराज, यतः नरक का परिणाम पुन: पाप योनि में जन्म ही है, अतः नरक भी श्रेष्ठ नहीं है तथा सर्वभुवन का आधिपत्य भी श्रेष्ठ नहीं है, क्योकि जहाँ विवेकी पुरुषों का मन पूर्णकाम होता है, तत्स्वरूप वहाँ कुछ भी नहीं है ॥ ३ ५॥ उस प्रकार के सम्पूर्ण विविध सृष्टियों के क्रम मनुष्य को बुद्धि में मूढता के कारण ही रम्य प्रतीत होते हैं । (परन्तु विवेकी पुरुषों को इस प्रकार विचारित हुए ये सभी विविध सृष्टियों के क्रम तनिक भी रम्य प्रतीत नहीं होते) इसलिए जो विचारपटु बड़े-बड़े सन्त हैं, वे अनित्यत्वबुद्धि से गृहीत पदार्थो मेँ आत्यन्तिक विश्रान्ति को किस तरह प्राप्त होगे ? अर्थात्‌ उनकी उनमें आस्था हो ही नहीं सकती