Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सस्वर्गे ससुरालोके सपाताले सदिक्तटे ।
जगत्यस्मिंस्तु सर्वस्मिन्न किंचिच्छोभनं स्थिरम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
योंतीनों लोकों की अशुभरूपता बतलाकर उसके अन्दर के जगत की भी अशुभरूपता बतलाते हैं ।
महाराज, जिसमें स्वर्ग, देवलोक, पाताल एवं दसों दिशाएँ हैं, ऐसे इस सम्पूर्ण जगत में कुछ भी
स्थिर सुखरूप तात्त्विक पदार्थ नहीं है