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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 20

41 verse-groups

  1. Verse 1उन्नीसर्वौ सर्गे समाप्त बीसवाँ सर्ग प्रत्येक कल्प मेँ जगत की समता, भाईयों की मृत्यु ओर प्…
  2. Verse 2इसलिए हे मुनीन्द्र, यद्यपि यह वृत्तान्त भूतकालीन है, तथापि “जगत भ्रान्तिमात्र है” यों अभ्…
  3. Verse 3अब, लम्बी कथा का उपक्रम करने पर पूजा में विलम्ब न हो जाय, इसलिए पहले पूजन-स्वीकार की प्रा…
  4. Verse 4मुनिवर ! यह नीड, यह शाखा, यह मैं, यह कल्पवृक्ष - ये सब आज आपके दर्शन से अत्यंत पवित्र हो…
  5. Verse 5मुनिवर, विहगो (पक्षियों) द्वारा समर्पित इस अर्घ्य ओर पाद्य का स्वीकार कर एवं हम लोगों को…
  6. Verse 6वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, दूसरी बार स्वयं उस भुशुण्ड पक्षी के द्वारा अर्घ्य, पाद्य देन…
  7. Verse 7हे पक्षिराज, वैसे बली ओर महाबुद्धिमान तुम्हारे वे भाई यहाँ क्यों नहीं दिखाई देते, तुम अके…
  8. Verse 8भुशुण्ड ने कहा : मुनिवर, हम लोगों को यहाँ रहते महान काल बीत गया । हे अनघ, दिवस-पंक्तियों…
  9. Verse 9इतना लम्बा काल होने के कारण सभी मेरे भाई, तृण के सदृश, शरीर छोडकर शिवपद में परिणत हो गये
  10. Verse 10ब्रह्मन्‌, यद्यपि दीर्घायु हों, महान हों, सज्जन हों, बलवान हो, सभी को यह अलकषितस्वरूपवाला…
  11. Verse 11महाराज वसिष्ठजी ने कहा : प्रिय पक्षिराज, माला की नाई अपने कन्धे पर बारह सूर्य ओर चन्द्रमा…
  12. Verse 12भुशुण्डजी, चिरकाल से अत्यन्त आसन्न उदयाचल ओर अस्ताचल के अरण्यं को दग्ध कर देनेवाले सूर्य…
  13. Verse 13वायसराज, जल को पाषाण के सदुश कठोर बना देनेवाले शीतल चन्द्रकिरणों ओर निकट प्रलय के लिए हो…
  14. Verse 14प्रियवर, मेरु-शिखर पर विश्रान्ति किये प्रलयकालीन मेघ-मण्डलों से तथा परशु की धारा को भी क्…
  15. Verse 15अत्यन्त ऊँचे स्थान पर स्थित हुआ यह उन्नत कल्पवृक्ष जगत के विषम क्षोभं से क्यों क्षुब्ध नह…
  16. Verse 16कठिन समय आने पर जब बड़े-बड़े लोगों को भी क्षोभ हो सकता है, तव पक्षी जैसी अधम योनि में उत्…
  17. Verse 17ऐसी तुच्छ योनियों के लिए भी विधाता ने रनों, वनों और शून्यसदृश आकाश में प्रीतिपूर्वक जो जी…
  18. Verse 18भगवन्‌, इस तुच्छ जाति में उत्पन्न, चिरकाल से जीवन बीता रहा ओर आशारूपी पाशो से निरन्तर बद्…
  19. Verse 19भगवन्‌, तथापि हम अपनी आत्मा में ही सदा सन्तोष मानकर अवस्थित हैं, इसलिए उत्पन्न हुए विभ्रम…
  20. Verse 20ब्रह्मन्‌, हम लोग अपने सत्तास्वभाव में ही सन्तुष्ट रहते हैं, कष्ट पहुँचानेवाले परपीडन-व्य…
  21. Verse 21महाराज, हम लोग अपने जीवन से न देह की एेहिक या आमुष्मिक फल के लिए कोई क्रिया चाहते हैं और…
  22. Verse 22महर्षे, हमने प्राणियों की जन्म, मरण आदि अनर्थ-दशाएँ देख लीं और मिथ्यात्व-निर्णायक स्वप्न…
  23. Verse 23कल्पवृक्ष के प्रभाव से ही कल्प-समाप्ति तक हम लोगों को खेद नहीं होता, यह कहते हैं। निरन्तर…
  24. Verse 24प्रकाश अधिक होने के कारण जब दिन और रात का विभाग ही ज्ञात नहीं हो सकता, तब यहाँ स्थित होकर…
  25. Verse 25मुनिवर, दिन और रात जाने बिना ही इस उन्नत शिखर पर अपनी बुद्धि से ही लोकों के कालक्रम की स्…
  26. Verse 26मन की स्थिरता के बल से मुझे खेद नहीं प्रतीत होता, इस आशय से कहते हैं। मुनिवर, यह सारभूत व…
  27. Verse 27सांसारिक व्यवहारों से जनित असत्रूप आशारूपी पाशों से जिस प्रकार अल्पध्वनियों से प्राकृत का…
  28. Verse 28धैर्य के कारण भी हमें खेद प्राप्त नहीं होता, यों कहते हैं। निरतिशय शान्ति पहुँचानेवाली और…
  29. Verse 29हे महाबुद्धे, दशाक्रम के अनुसार भयंकर दशाएँ भी प्राप्त हो जाय, तथापि स्थिर बुद्धिवाले हम,…
  30. Verse 30जगत-तत्त्व के पुनः विमर्शबल से भी खेद नहीं होता, यों कहते हैं। प्रारम्भ में रमणीय दीख पड़…
  31. Verse 31“जातस्य ही ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च“ (उत्पन्न हुआ निश्चित मरता है दुःख अपरिहार्य…
  32. Verse 32तत्त्वज्ञस्वरूप अपने में तटस्थता, समस्त भूतो के संसार का दरष्ट्रत्व और संसार के प्रति आदर…
  33. Verse 33महर्षे, इस वृक्ष पर उपस्थित हुए हम लोग प्राप्त वस्तुओं का न परित्याग करते हैं, एवं न अप्र…
  34. Verse 34बड़े लोगों के अनुग्रह से भी हम लोगों को खेद-प्राप्ति नहीं होती, ऐसा कहते है। शोक, भय ओर आ…
  35. Verse 35भगवन्‌, व्यवहार चलाने के लिए इधर-उधर प्रेरित हुआ भी हम लोगों का मन राग आदि वृत्तियों में…
  36. Verse 36अपनी आत्मा के निर्विकार, क्षोभशून्य ओर शान्त हो जाने के कारण चिद्रूप (चारों ओर से ब्रह्मा…
  37. Verse 37भगवन्‌, जिस अमृत के लिए मन्दराचल द्वारा सर्वागों से क्षुब्ध हुए क्षीर-सागर का मंथन किया ज…
  38. Verse 38समस्त एषणाओं की तिलांजलि देनेवाले सन्त, महात्मा अपने आगमन आदि से हम पर जो अनुग्रह करते है…
  39. Verse 39ऊपर-ऊपर से रमणीय दिखाई पडनेवाले विषय-भोगों से क्या प्राप्त होता है ? अर्थात्‌ कुछ भी नहीं…
  40. Verse 40हे मुनिवर, स्नेहपूर्ण, गम्भीरः मधुर, उदार ओर धीर वाणीवाले एकमात्र आप ही इस त्रिभुवनरूपी क…
  41. Verse 41साधो, यद्यपि मेने परमात्मा को जान लिया है ओर आपके दर्शन से मेरे समस्त पाप नष्ट हो चुके, त…