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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

सर्वाण्येव प्रयान्त्येव समायान्ति च वा न वा । भगवन्भूतजालानि भयमस्माकमत्र किम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

“जातस्य ही ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च“ (उत्पन्न हुआ निश्चित मरता है दुःख अपरिहार्य है, यों निश्चय होने के कारण भी भयप्राप्ति नहीं होती, यों कहते हैं। भगवन्‌, सभी प्राणी व्यवहारदृष्टि से आते हैं और जाते हैं अथवा परमार्थदृष्टि से न आते हैं और न जाते हैं, इसलिए हम लोगों को यहाँ भय ही क्या