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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । आसीत्किंचित्पुरा कल्पे जगद्यच्चिरमास्थितम् । संनिवेशेन चैतद्वदद्यापि च न दूरगम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

उन्नीसर्वौ सर्गे समाप्त बीसवाँ सर्ग प्रत्येक कल्प मेँ जगत की समता, भाईयों की मृत्यु ओर प्रलयकाल में भी अपने चित्त की स्थिरता का भुशुण्ड द्वारा वर्णन । त्तं स्मरसि किव वा इस प्रश्न का विस्तार से उत्तर देने की इच्छावाला ओर इम कल्पतरु प्राप्य निजं नीडं प्रविश्य च“ इत्यादि वृत्तान्त में पूवापर विरोध की शंका न हो जाय, इसलिए प्रत्येक कल्प में अवयवो की समता होने के कारण कल्पवृक्ष, मेरु आदि की एकता कही जाती है ~ यह आशय बतलाते है । भुशुण्ड ने कहा : महाराज वसिष्ठजी, हम लोगों के जन्मनिमित्त कल्प में चिरकाल तक जो कुछ पदार्थसमूहात्मक जगत स्थित था, वह सब अवयवसंस्थान आदि आकृति-विशेषों से इस कल्प के पदार्थो के सदृश ही था, अतः वह आज भी अभेद आरोप से सन्निहित ही है, इसलिए बुद्धिपूर्वक ही "इमं कल्पतरूम्‌“ इत्यादि निर्देश किया गया है