Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
इयमारम्भसुभगा तरला जागती स्थितिः ।
भूयो भूयः परामृष्टा न च किंच न बाधते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जगत-तत्त्व के पुनः विमर्शबल से भी खेद नहीं होता, यों कहते हैं।
प्रारम्भ में रमणीय दीख पड़नेवाली, तरल इस संसार-स्थिति का बार-बार परामर्श किया जा
चुका है, अतः वह हमें कुछ बाधा नहीं पहुँचाती