Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 14
27 verse-groups
- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, योगियों के विश्रान्तिस्थानरूप से वर्णित उस न…
- Verse 2उस ब्रह्माण्ड में मनु, प्रजापति आदि की उत्पत्ति में कारणता को प्राप्त तथा प्राणियों के सम…
- Verse 3उस पितामह ब्रह्मदेव का मे सदाचार-सम्पन्न वसिष्ठ नाम का मानस हू । और ध्रुवजी द्वारा धारण क…
- Verse 4महाराज इन्द्रदेव की सभा में बैठे हुए मैंने किसी समय स्वर्गलोक में महर्षि नारदजी से अधिक द…
- Verse 5चिरंजीवियों की कथाओं मे किसी एक कथा के प्रसंग में मितभाषी, सम्माननीय तथा निखिल शास्त्रों…
- Verse 6मुनि ने जो कुछ कहा, उसे बतलाते हैं। मेरुपर्वत के ईशानकोण में स्थित पद्यरागमणि के सदृश चमक…
- Verse 7उस कल्पतरु के ऊपर सुवर्णं और रजतमय कल्पलताओं से घने दाहिने तने के खोड़रे में एक घोंसला है
- Verse 8उस घोसले में ऐश्वर्यशाली वीतराग भुशुण्डनामक कौआ उस प्रकार निवास करता है, जिस प्रकार विशाल…
- Verse 9हे देवगण, जगत के इस कोश में वह वायसराज भुशुण्ड जिस प्रकार चिरकाल से जी रहा है, उस प्रकार…
- Verse 10वह (भुशुण्ड) दीर्घायु है, वह रागरहित है, वह ऐश्वर्ययुक्त है, वह विशाल-बुद्धि है, वह स्थिर…
- Verse 11वह पक्षी (भुशुण्ड) जिस प्रकार दीर्घकाल से जी रहा है, उस प्रकार यदि कोई प्राणी यहाँ अपना द…
- Verse 12श्रीरामजी, कुछ समय के अनन्तर मेने भुशुण्ड के विषय में फिर भी शातातप मुनि से पूछा था, द्वि…
- Verse 13श्रीरामजी, कथा का अवसर समाप्त हुआ और देवतागण अपने-अपने निवासस्थान पर चले गये । तदनन्तर मे…
- Verse 14जहाँ भुशुण्डपक्षी की स्थिति थी, उस मेरुपर्वत के पद्मरागमणि की तरह चमकी ले सुन्दर एवं विस्…
- Verse 15वह शिखर मधुर आसव से जनित मद की नाईं अग्नि के सदृश वर्चस्व रखने वाले पद्मराग आदि रत्न एवं…
- Verse 16उसकी शोभा प्रलयकालीन अग्नि की पिण्डीभूत ज्वालाओं के पर्वत-सी प्रतीत होती थी, शिखा के सदुश…
- Verse 17मेरुपर्वत के ऊपर समस्त लालिमाओं का एक ढेर-सा होकर वह अवस्थित था या यों कहिए कि निखिल प्रा…
- Verse 18सुषुम्ना-नाड़ी से उत्क्रान्ति नामक योग-साधन के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र का भेदन कर निकलने की इ…
- Verse 19वह लीला से आकाश में स्थित चन्द्रमा को पकड़ने के लिए लाक्षारस से (महावर से) रंजित शिखा के…
- Verse 20वह जड़ी गयी सोपान-पंक्तियों के सदूश अरुण ज्वालाओं के द्वारा मानों आकाश में जाने के लिए प्…
- Verse 21वह रत्नों के किरणों से चमक रहे नखाग्रों से युक्त तीन शिखराग्रभागरूपी अंगुलियों से अश्विनी…
- Verse 22वहाँ मेघरूप मृदंग आदि वाद्य बज रहे थे, वह वनभूमि से पुष्ट हुई वन-लक्षिमयों का एक तरह से न…
- Verse 23वह परिहास से विकसित हो रही दन्तपंक्तियों के सदृश विकसित ताल पत्रों की पंक्तियों से अत्यन्…
- Verse 24अब उस शिखर की तापसरूप से उत्प्रक्षा करते हैं। उसने सुन्दर आकाशरूपी मृगचर्म धारण किया था,…
- Verse 25वहाँ पर गंगाजी के झरनों की कलकल ध्वनि हो रही थी, उसके लताकुंजों में देवता विराजित थे, वह…
- Verse 26हे श्रीरामचन्द्रजी, आकाश में ऊँचाई की परम सीमास्वरूप उस प्रकार के पीले वर्ण के उस मेरुपर्…
- Verse 27श्रीरामजी, (मैं इसका अधिक वर्णन क्या करूँ !) वह प्रतिदिन श्वेत, हरित, पीत, रक्त एवं धवलवर…