Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
ताराः स्प्रष्टुमिवाकाशमङ्गुलीभिरिव त्रिभिः ।
कचदंशुनखाग्राभिः परिचुम्बदिवोन्नतम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
वह रत्नों के किरणों से चमक रहे नखाग्रों से
युक्त तीन शिखराग्रभागरूपी अंगुलियों से अश्विनी आदि नक्षत्र मण्डलों को स्पर्श कर मानों गिनने के
लिए आकाश को व्याप्त-सा करता हुआ उन्नत होकर स्थित था