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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्ति तावदनन्तस्य तस्य क्वचिदयं किल । जगद्रूपः परिस्पन्दो मृगतृष्णा मराविव ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, योगियों के विश्रान्तिस्थानरूप से वर्णित उस निःसीम परम पद के किसी एक प्रदेश में (अविद्या से आवृत प्रदेश में), मरुभूमि मेँ मृग तृष्णा की नाई, ब्रह्माण्डाकार यह विवर्तं प्रसिद्ध है