Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 20
18 verse-groups
- Verse 1उननीसवाँ सर्गे समाप्त बीसवाँ सर्ग पुण्य द्वारा पावन के तथा अपने नाना योनियों में जन्मों क…
- Verse 2बन्धु, मित्र, पुत्र, स्नेह, द्वेष, मोहदशारूप रोग से युक्त यह प्रपंच अपने द्वारा किये गये…
- Verse 3पुरुष शत्रु होता हे । विष ओर अमृत की दशा के समान यहाँ पर स्थिति भावमयी है । जैसे विष के क…
- Verse 4बन्धुओ की वास्तविकता का विचार जाने दीजिये, उनके प्रति शोक करनेवाले तुम यदि केवल स्वत्व का…
- Verse 5यदि कोई शंका करे कि सम्पूर्ण देहो में मैं कैसे एक हूँ, तो इस पर अहप्रत्यवेद्य का ही यह कौ…
- Verse 6परमार्थदुष्टि से न पावन शब्द वाच्य तुम कोई हो अथवा न पुण्य शब्द वाच्य मैं ही कोई हूँ, यह…
- Verse 7इस प्रकार पिता आदि का शरीर भी भ्रान्ति से अतिरिक्त कुछ भी नहीं ठहरता, यह कहते हैं। कोन तु…
- Verse 8यदि लिंग शरीर ही अपार मेरे बन्धु हैं, ऐसा मानो, तो इस पर चुनो, ऐसा कहते है । यदि तुम मुझस…
- Verse 9उन भूली हुई वनस्थलिया में तुम्हारे मृग योनियों में उत्पन्न बहुत से मृग बन्धु हुए थे, उनके…
- Verse 10कमलके वनों में और नदियों के तटों पर हंसरूप तुम्हारे हंस बन्धु हुए थे... उनके लिए तुम शोक…
- Verse 11अन्य जन्मों में बड़ी विचित्र वनपंक्तियों में तुम्हारे बहुत से वृक्ष अत्यन्त बन्धु हुए थे,…
- Verse 12बड़े ऊँचे-ऊँचे पर्वत-शिखरों पर तुम्हारे बहुत सिंह बान्धव हुए थे, उनके लिए तुम शोक क्यों न…
- Verse 13नदियों, तालाबों ओर पोखरो में तुम्हारे बहुतसे मत्स्य बन्धु हुए थे, उनके लिए तुम शोक क्यों…
- Verses 14–21अब योगबल से देखे गये भाई के विविध जन्मो का विशेषरूप से स्मरण कराते हुए कहते हैँ । हे वत्स…
- Verses 22–30हे वत्स, इन अन्यान्य बहुत सी जीवयोनियों में इसी जम्बू द्वीप में पहले सैकड़ों, हजारों बार…
- Verses 31–36ऐसी अवस्था में जगत में उत्पन्न हुए सैकड़ों माता, पिता, भाई, बन्धु ओर मित्र चले गये । उनमे…
- Verses 37–41स्थित हैँ । जैसे दीपक रात्रि आने पर प्रकाशन क्रिया में सन्निधिमात्र से कर्ता होते हुए भी…
- Verses 42–43अब दूसरा दृष्टान्त कहते हैँ । जैसे हाथ में स्थित दर्पण, रत्न आदि प्रतिबिम्ब की उपाधिभूत व…