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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

बन्धुत्वे भावितो बन्धुः परत्वे भावितः परः । विषामृतदशेवेह स्थितिर्भावनिबन्धनी ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

पुरुष शत्रु होता हे । विष ओर अमृत की दशा के समान यहाँ पर स्थिति भावमयी है । जैसे विष के कृमियों द्वारा विष की यह हमारा जीवन हेतु है, यों दृढ़ भावना करने से उनके प्रति वह अमृत हो जाता है और लोगों द्वारा यह हमारे मरण का हेतु हैं, यों भावना करने से उनके प्रति विष होता है, इसी प्रकार जगत की स्थिति भावनामयी है, यह भाव हे