Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
एकत्वे विद्यमानस्य सर्वगस्य किलात्मनः ।
अयं बन्धुः परश्चायमित्यसौ कलना कुतः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
बन्धुओ की वास्तविकता का विचार जाने दीजिये, उनके प्रति शोक करनेवाले तुम यदि केवल
स्वत्व का विचार करो, तो उसीसे उनका निरास हो सकता है, इस आशय से कहते है।
सब देहो में अग्निरूप से विद्यमान, सर्वव्यापी आत्मा की यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, ऐसी
कल्पना कैसे हो सकती है ?