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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

बन्धुमित्रसुतस्नेहद्वेषमोहदशामयः । स्वसंज्ञामात्रकेणैव प्रपञ्चोऽयं वितन्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

बन्धु, मित्र, पुत्र, स्नेह, द्वेष, मोहदशारूप रोग से युक्त यह प्रपंच अपने द्वारा किये गये संकेत से ही विस्तार को प्राप्त होता है