Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verses 31–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, verses 31–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 31-34
संस्कृत श्लोक
एवं स्थिते जगज्जाता बान्धवाः शतशो गताः ।
पितरो मातरश्चैव भ्रातरः सुहृदस्तथा ॥ ३१ ॥
कांस्तान्समनुशोचावो न शोचावश्च कानपि ।
बन्धूनिहातिशोचाव ईदृश्येव जगद्गतिः ॥ ३२ ॥
अनन्ताः पितरो यान्ति यान्त्यनन्ताश्च मातरः ।
इह संसारिणां पुंसां वनपादपपर्णवत् ॥ ३३ ॥
किं प्रमाणमतः पुत्र दुःखस्यात्र सुखस्य च ।
तस्मात्सर्वं परित्यज्य तिष्ठावः स्वच्छतां गतौ ॥ ३४ ॥
प्रपञ्चभावनां त्यक्त्वा मनस्यहमिति स्थिताम् ।
तां गतिं गच्छ भद्रं ते यां यान्ति गतिकोविदाः ॥ ३५ ॥
इहाजवं जवीभावं पतनोत्पतनात्मकम् ।
न च शोचन्ति सुधियश्चिरं वल्गन्ति केवलम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी अवस्था में जगत में उत्पन्न हुए सैकड़ों माता, पिता, भाई, बन्धु ओर
मित्र चले गये । उनमें से किनका शोक करें, किनका शोक न करें एवं उन बन्धुओं का अतिक्रमण कर
यहाँ किनका शोक करें, इसलिए किन्हीं का भी शोक हम नहीं करते क्योंकि ऐसी जगत की गति है। वन
के वृक्षों के पत्तों के समान संसारी पुरुषों के अनन्त पिता जाते हैं, अनन्त माताएँ जाती हैं । इसलिए हे
वत्स, यहाँ पर दुःख-सुख की क्या अवधि है ? अतः सबका त्याग कर स्वच्छता को प्राप्त हुए हम लोग
स्थित हैं