Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
प्रतिबिम्बे न दृश्यन्ते स्वात्मबिम्बगतैरपि ।
यथा दर्पणरत्नाद्यास्तथा कार्ये महाधियः ॥ ४२ ॥
सर्वैषणामयकलङ्कविवर्जितेन स्वस्थात्मभावकलितेन हृदब्जमध्ये ।
पुत्रात्मनात्मनि महामुनिनामुनैव संत्यज्य संभ्रममलं परितोषमेहि ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब दूसरा दृष्टान्त कहते हैँ ।
जैसे हाथ में स्थित दर्पण, रत्न आदि प्रतिबिम्ब की उपाधिभूत वस्तुएँ बिम्बभूत अपनी सारी देह में
स्थित सब धर्मो के साथ भी स्वदेह में रचित प्रतिबिम्ब में बिम्ब के अन्य धर्मो के समान स्वयं निविष्ट नहीं
दिखाई देती वैसे ही स्वात्मा में अध्यस्त कार्यो के कर्ता होते हुए भी महामति पुरुष स्वयं उनमें
अभिनिवेशवाले नहीं होते । हे वत्स, सब एषणामय कलंकों से रहित अतएव मननशील, अपने से ही
अपने हृदयकमल में स्वस्थ आत्मरूप से साक्षात्कृत एवं संसार भ्रम का सर्वथा त्यागकर परिशिष्ट हुए
इस आत्मा से ही सन्तोष को प्राप्त होओ