Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 19
अद्रारहर्वौँ सर्ग समाप्त उन्नीसर्वों सर्ग पूर्वोक्त कथन की सिद्धि के लिए पुण्य ओर पावन के आख्यान का वर्णन, जिसमें पुण्य ने पितृशोकार्त पावन को ज्ञानोपदेश दिया |
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- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त विषय में ही मुनिपुत्र दो भाइयों के गं…
- Verses 3–9गर्जता है, इसने गुफाओं के अन्दर होनेवाले झरनों के कलरव से समुद्रजल कल्लोलों के विलास को स…
- Verses 10–11उस आकाशगंगा के दैदीप्यमान, सुवर्ण-से पीले तट पर, जहाँ फूले हुए वृक्ष थे और रत्नमयपर्वत के…
- Verse 12उस मुनि के चन्द्रमा के तुल्य सुन्दर पुण्य ओर पावन नाम के दो लड़के थे, यदि बृहस्पति के कच…
- Verse 13दीर्घतपा मुनि उन दोनों पुत्रों और भार्या के साथ फल से लदे हुए वृक्षों से पूर्ण उस गंगातट…
- Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, समय बीतने पर उनके दो लड़कों में से पुण्य नामवाला बड़ा लड़का तत्त्वज्ञ…
- Verse 15पावन प्रातःकाल की सन्ध्या के कमल के समान अर्धं प्रबुद्ध हुआ । मूर्खता से तो बाहर हो गया,…
- Verses 16–18तदनन्तर प्राणियों द्वारा आयु के क्षयरूप से लक्षित सौ संवत्सरकाल के “जिसने उनकी दीर्घ देहर…
- Verses 19–24जेस फूल की सुगन्ध आकाश में जाती है, वैसे ही जिसमें कलना क्रिया शान्त है एवं चेत्य से रहित…
- Verse 25तत्त्वज्ञानी पुण्य माता-पिता का ओध्वदिहिक कर्म समाप्त कर वन में शोक से व्याकुल पावन के सम…
- Verse 26पुण्य ने कहा : हे वत्स, जैसे वर्षा ऋतु अन्धता की एकमात्र कारण तथा भाप के समूह को धारण करन…
- Verses 27–31हे महाप्राज्ञ, तुम्हारे पिता तुम्हारी माता के साथ स्वरूपभूत, मोक्ष नामक परमात्मपदवी को प्…
- Verses 32–34हे वत्स जैसे प्रत्येक वन में जलप्रवाह के बहुत से गड्डे होते हैं, वैसे ही तुम्हारे हजारों…
- Verse 35हे वत्स, यदि माता, पिता, पुत्र आदि स्नेहवश शोक के योग्य हैं, तो निरन्तर अतीत हजारों माता-…
- Verses 36–38हे महाभाग, जगत की कल्पना के निमित्तभूत मोह के होने पर ही यह प्रपंच दिखाई देता हे हे प्राज…
- Verses 39–41हे वत्स, पारमार्थिक दृष्टि से तुम सत्य का विचार करो, न तो तुम हो और न हम हैं । तुम्हारे भ…