Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 27–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, verses 27–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 27-30
संस्कृत श्लोक
पिता तव महाप्राज्ञ गतः सार्धं त्वदम्बया ।
स्वामेव परमात्मात्मपदवीं मोक्षनामिकाम् ॥ २७ ॥
तत्स्थानं सर्वजन्तूनां तद्रूपं विजितात्मनाम् ।
स्वभावमभिसंपन्ने किं पितर्यनुशोचसि ॥ २८ ॥
ईदृशी तु त्वया बद्धा भावनेह विमोहजा ।
संसारे यदशोच्योऽपि त्वया तातोनुशोच्यते ॥ २९ ॥
न सैव भवतो माता नासावेव पिता तव ।
न भवानेष तनयस्तयोर्निःसंख्यपुत्रयोः ॥ ३० ॥
मातापितृसहस्राणि समतीतानि ते सुत ।
बहून्यम्बुप्रवाहस्य निम्नानीव वने वने ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महाप्राज्ञ, तुम्हारे पिता तुम्हारी माता के साथ स्वरूपभूत, मोक्ष नामक परमात्मपदवी को प्राप्त
हो गये है । वही सब जन्तुओं का उत्पत्ति आदि तीनों कालों मेँ आधारभूत है । ब्रह्मवेत्ताओं का वह
स्वरूप है । पिता के अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाने पर तुम क्यो शोक करते हो ? तुमने, यही मेरी माँ
है, यही मेरे पिता है, इस प्रकार की मोह से उत्पन्न हुई भावना यहाँ पर बाँध रक्खी है, जिससे शोक के
अयोग्य पिता का भी तुम शोक करते हो । न वही तुम्हारी माता है, न वही तुम्हारे पिता हैं तथा असंख्य
पुत्रवाले उनके न तुम्हीं पुत्र हो