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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 39–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, verses 39–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 39-41

संस्कृत श्लोक

दृष्ट्या तु पारमार्थिक्या पुत्र सत्यं विचारय । नैव त्वं न वयं चैव भ्रान्तिमन्तः परित्यज ॥ ३९ ॥ अयं गतो मृतश्चायमिति दुर्दृष्टयः पुरः । स्वसंकल्पोपतापोत्था दृश्यन्ते नतु सत्यतः ॥ ४० ॥ अज्ञानविस्तीर्णमरौ विलोलं शुभाशुभस्यन्दमयैस्तरङ्गैः । सवासनानाममरीचिवारि परिस्फुरत्येतदनन्तरूपम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वत्स, पारमार्थिक दृष्टि से तुम सत्य का विचार करो, न तो तुम हो और न हम हैं । तुम्हारे भीतर जो भ्रान्ति है, उसका तुम त्याग करो । यह गया, यह मर गया इत्यादि दुर्दृष्टियाँ अपने संकल्परूप सन्निपातभ्रम से उत्पन्न हुई सामने दिखाई देती हैं, परमार्थतः नहीं दिखाई देती है। अज्ञानरूप धूप से आच्छन्न मरुभूमि सदुश आत्मा में पुण्य-पापरूप प्रवाह से युक्त तरंगों से चंचल स्वसंकल्प वासना नामक यह असीम मृग जल परिस्फुरित होता है