Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 16–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 16-18

संस्कृत श्लोक

ततो वहत्यकलिते काले कलितकारणे । संवत्सरशते जीर्णदीर्घदेहलतायुषि ॥ १६ ॥ अस्माद्भङ्गुरभूताढ्याद्वृत्तान्तशतभीषणात् । रतिमुत्सृज्य संसाराज्जराजर्जरजीवितः ॥ १७ ॥ कलनापक्षिणी नीडं देहं दीर्घतपा मुनिः । जहौ गिरिगुहागेहे भारं वैवधिको यथा ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर प्राणियों द्वारा आयु के क्षयरूप से लक्षित सौ संवत्सरकाल के “जिसने उनकी दीर्घ देहरूपी लता और आयु जीर्णं कर दी थी" बीतने पर इस क्षणभंगुर प्राणियों से पूर्ण, जन्म, जरा, मरण, स्वर्ग से पतन, नरक आदि सेकड़ों वृत्तान्तं से भयंकर संसार का अनुराग त्याग कर जरा से जर्जरित जीवनवाले दीर्घतपा मुनि ने गिरि-गुफारूपी घर मेँ कलनारूप चिड़िया के घोंसले रूप देह का, जैसे भारवाहक पुरुष घर में भार का त्याग करता है, वैसे ही त्याग किया