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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 32–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 32-34

संस्कृत श्लोक

असंख्यपुत्रयोर्नैव भवानेव सुतस्तयोः । सरित्तरङ्गवत्पुत्र गताः पुत्रगणा नृणाम् ॥ ३२ ॥ अस्मत्पित्रोरतीतानि पुत्रलक्षाण्यनेकशः । पत्रकोरकवृन्तानि लताविटपयोरिव ॥ ३३ ॥ मित्रबान्धववृन्दानि जन्तोर्जन्मनि जन्मनि । ऋतावृतावतीतानि फलानीव महातरोः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वत्स जैसे प्रत्येक वन में जलप्रवाह के बहुत से गड्डे होते हैं, वैसे ही तुम्हारे हजारों माता-पिता हो चुके हैं ॥३ १॥ हे वत्स, असंख्य पुत्रवाले उनके तुम्हीं केवलपुत्र नहीं हो । नदियों की तरगों के समान मनुष्यों की बहुत-सी पुत्र राशियाँ व्यतीत हो चुकी हैं। जैसे लता और शाखा के लाखों पत्ते, कोंपलें, डंठल व्यतीत होते है, वैसे ही हमारे माता और पिता के अनेक लाखों पुत्र बीत चुके हैं | जैसे महावृक्ष के प्रत्येक ऋतु में फल व्यतीत होते हैं वैसे ही जन्तु के प्रत्येक जन्म में मित्र, बान्धव आदि के वृन्द व्यतीत हुए हैं