Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 36–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 36-38
संस्कृत श्लोक
प्रपञ्चोऽयं महाभाग दृश्यते जागते भ्रमे ।
परमार्थेन ते प्राज्ञ नास्ति मित्रं न बान्धवाः ॥ ३६ ॥
न नाश इव हि भ्रातः परमार्थेन विद्यते ।
महत्यपि चिरातप्ते मराविव पयोलवाः ॥ ३७ ॥
एता याः प्रेक्षसे लक्ष्मीश्छत्रचामरचञ्चलाः ।
स्वप्न एव महाबुद्धे दिनानि त्रीणि पञ्च वा ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महाभाग, जगत की कल्पना
के निमित्तभूत मोह के होने पर ही यह प्रपंच दिखाई देता हे हे प्राज्ञ, परमार्थतः आपके मित्र, बन्धु-
बान्धव है ही नहीं । हे भ्राता, चिरकाल से संतप्त महान मरुस्थल में जैसे जल बिन्दु नहीं रहते, वैसे
ही ब्रह्मस्वभाव होने के कारण परमार्थ दृष्टि से यहाँ नाश नहीं है | ब्रह्मबोध होने पर तो कहना ही
क्या है ? जो इन छत्र, चामरो से चंचल राजसम्पत्तियों को तुम देखते हो, हे महाबुद्धे, यह तीन
अथवा पाँच दिनों का स्वप्न ही है