Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, Verses 19–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 19, verses 19–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 19-24
संस्कृत श्लोक
प्रशान्तकलनारम्भं चेत्यरिक्तचिदास्पदम् ।
पदं जगाम नीरागं पुष्पगन्ध इवाम्बरम् ॥ १९ ॥
अथ भार्या मुनेर्देहं प्राणापानविवर्जितम् ।
दृष्ट्वा विलुलितं भूमौ विनालमिव पङ्कजम् ॥ २० ॥
चिरमभ्यस्तया योगयुक्त्या पतिवितीर्णया ।
तत्याज तनुमम्लानां षट्पदी पद्मिनीमिव ॥ २१ ॥
भर्तारमेवानुययौ जनस्यादृष्टतां गता ।
प्रभागगनकोशस्थमस्तं यातमिवोडुपम् ॥ २२ ॥
मातापित्रोस्तु गतयोरौर्ध्वदेहिककर्मणि ।
पुण्य एव स्थितोऽव्यग्रः पावनो दुःखमाययौ ॥ २३ ॥
शोकोपहतचित्तोऽसो भ्रमन्काननवीथिषु ।
ज्यायांसमनवेक्ष्यैव पावनो विललाप ह ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जेस फूल की सुगन्ध आकाश में जाती है, वैसे ही जिसमें कलना क्रिया शान्त है एवं चेत्य से
रहित जो तत्तद् जीव चेतन हैं, उनके स्थानभूत रागरहित परम पद को वे प्राप्त हुए | तदनन्तर मुनि
की पत्नी ने प्राण ओर अपान से रहित मुनि की देह को नालरहित कमल के समान गिरी हुई देख कर
पति द्वारा सिखाई गई चिरकाल से अभ्यस्त योगक्रिया से अपने शरीर का, जो रोग, बुढापे आदि से
जर्जरित नहीं हुआ था, ऐसे त्याग किया, जैसे भँवरी अम्लान कमलिनी का त्याग करती हे । लोगों की
अदुश्यता को प्राप्त उसने जैसे प्रभा आकाश में स्थित अस्त को प्राप्त हुए चन्द्रमा का अनुसरण करती
है वैसे ही पति का ही अनुसरण किया । माता-पिता के चले जाने पर उनके ओंध्वदेहिक कर्म में पुण्य
ही अव्यग्रता पूर्व स्थित रहा और पावन दुःख को प्राप्त हुआ । शोक से व्याकुल चित्तवाला वह पावन
अरण्य भूमियों मे घूमता हुआ अपने ज्येष्ठ भाई के समान धैर्य का अवलम्बन न कर विलाप करता
था