Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 10
नवाँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग मध्याह्न काल के कृत्यों में प्रवृत्त होने के लिए द्वारपाल द्वारा प्रार्थना करने पर भी राजा जनक का मौन होकर विचार करना |
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त प्रकार से विचार कर रहे राजा जनक के सा…
- Verse 2प्रतीहार ने कहा : हे देव, आपके भुजारूपी स्तम्भ पर समस्त पृथ्वी का भार स्थित है, आप उठिये,…
- Verse 3फूल, कपूर ओर कुंकुम से (केसर से) मिश्रित जल के घड़ों से युक्त ये स्त्रियाँ मूर्तिमती नदिय…
- Verses 4–6जहाँ पर कमल और श्वेतकमल के वन में भौरि घूम रहे हैं एवं कमल से युक्त कमल के नाल की रस्सियो…
- Verses 7–8हे देव, स्नान के समय अघमर्षण मन्त्रों का जप करनेवाले अतएव दक्षिणा के योग्य ब्राह्मण लोग,…
- Verse 9हे महाराज, आपका कल्याण हो, शीघ्र उठिये, नित्यकर्म का सम्पादन कीजिये। महापुरुष अपने कर्मो…
- Verse 10प्रतीहार के इस तरह कहने पर भी राजा जनक वैसे ही विचित्र संसार की स्थिति का चिन्तन करते रहे
- Verses 11–13सुखकररूप से स्थित यह राज्य कितना है ? यानी कुछ भी नहीं है । क्षणमात्र में नष्ट होनेवाले इ…
- Verses 14–15हे चित्त, तुम इस भोगाभ्यासरूपी दुर्भम से सुखलव के आस्वाद की जो चतुरता है, उसका जन्म, वृद्…
- Verses 16–17सब भोगभूमियों में बार-बार भोग की आशा से चिरकाल तक प्रवृत्त एवं भोग की शक्ति के कुण्ठित हो…
- Verse 18ऐसा विचार कर राजा जनक चित्त की चपलता के शान्त होने के कारण चित्र में अंकित के तुल्य मौन ह…
- Verse 19राजा ओं के चित्त के अनुवर्तन के विषय में अत्यन्त पटु उस द्वारपाल ने भी गौरव एवं भय से फिर…
- Verse 20तदनन्तर राजा जनक ने क्षणमात्र चुप रह कर पुनः शमयुक्तमन से प्राणियों के जीवन में हेतुभूत त…
- Verses 21–23इस संसार में क्या उपादेय हे, जिसको मैं प्रयत्न से सिद्ध करू । नाशरहित ऐसी कौन वस्तु है, ज…
- Verses 24–28मैं न तो अप्राप्त वस्तु की इच्छा करता हूँ और न प्राप्त वस्तु का त्याग ही करता हू । स्वस्थ…
- Verses 29–30कर्म से उत्पन्न हुई फल सम्पत्तियं मं कर्तृता ओर भोक्तृता मन से कल्पित हैँ । मन के शान्तहो…