Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 16, 17
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तं सन्निवृत्तं सद्भूयोभूयश्चिरंचिरम् ।
भोगभूमिषु सर्वासु चित्तं तृप्तिं न गच्छति ॥ १६ ॥
तस्मात्पापालमनया तुच्छया भोगचिन्तया ।
भवत्यकृत्रिमा तृप्तिर्येनाभिपत तं ततः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
सब भोगभूमियों में बार-बार भोग की
आशा से चिरकाल तक प्रवृत्त एवं भोग की शक्ति के कुण्ठित हो जाने से तथा लोक-शास्त्र के भय से
चिरकाल तक निवृत्त हुआ चित्त तृप्ति को प्राप्त नहीं होता है । इसलिए हे पापी मन, इस तुच्छ भोगचिन्तन
से कोई प्रयोजन नहीं हे । यह कृत्रिम सुख अनर्थ का बीज है, इसलिए जिस हेतु से अकृत्रिम (स्वाभाविक)
प्रीति उत्पन्न हो, उस हेतु को प्राप्त करो