Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
कर्मजासु फलश्रीषु मनसा कर्तृभोक्तृते ।
तस्मिन्प्रशान्तिमायाते कृतमप्यकृतं नृणाम् ॥ २९ ॥
यो निश्चयोऽन्तः पुरुषस्य रूढः क्रियास्वसौ तन्मयतामुपैति ।
अनामयं मे पदमाहता धीरधीरतामन्तरलं त्यजामि ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
कर्म से उत्पन्न हुई फल सम्पत्तियं मं कर्तृता ओर भोक्तृता मन से कल्पित हैँ । मन के शान्तहो
जाने पर मनुष्य का किया हुआ भी न किया हुआ एवं भोगा हुआ भी न भोगा हुआ हो जाता हे । पुरुष के
भीतर जैसे कर्तृता या भोक्तृता का निश्चय रूढ हो गया वह पुरुष सम्पूर्णं देह क्रियाओं में अपने
निश्चय के अनुकूल तन्मय हो जाता हे । इस समय मेरी बुद्धि कर्तृता और भोक्तृतारूपी रोग से शून्य
आत्मपद के दृढ़ निश्चय से सम्पन्न नहीं हे । इसलिए चित्त के भीतर कृत ओर अकृत कर्म के फल को
अवश्य भोगने के लिए पुनर्जन्म आदि की शंका से उत्पन्न तथा इष्ट प्राप्ति ओर अनिष्ट विघात से
उत्पन्न अधीरता का अच्छी तरह त्याग करता हूँ