Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verses 24–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, verses 24–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 24-28
संस्कृत श्लोक
नाभिवाञ्छाम्यसंप्राप्तं संप्राप्तं न त्यजाम्यहम् ।
स्वस्थ आत्मनि तिष्ठामि यन्ममास्ति तदस्तु मे ॥ २४ ॥
न ममेह कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
क्रिययाऽक्रियया वापि यत्प्राप्तं तदसन्मयम् ॥ २५ ॥
अकुर्वतः कुर्वतो वा युक्तायुक्ताः क्रिया मम ।
नाभिवाञ्छितमस्तीह यदुपादेयतां गतम् ॥ २६ ॥
तदुत्थाय क्रमप्राप्तां कायोऽयं प्रकृतां क्रियाम् ।
करोत्वस्पन्दिताङ्गस्तु किमयं साधु शुष्यति ॥ २७ ॥
स्थिते मनसि निष्कामे समे विगतरञ्जने ।
कायावयवजौ कार्यौ स्पन्दास्पन्दौ फले समौ ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं न तो अप्राप्त
वस्तु की इच्छा करता हूँ और न प्राप्त वस्तु का त्याग ही करता हू । स्वस्थ होकर अपने स्वरूप में स्थित
हूँ। जो मेरे प्रारब्ध से प्राप्त हैं, वही मुझे प्राप्त रहे ओर कुछ नहीं । यहाँ मेरा न तो कर्म से कोई प्रयोजन
है ओर न कर्म की उपेक्षा से कोई अनर्थ ही हे । क्रिया अथवा उसकी उपेक्षा से जो कुछ भी प्राप्त हे, वह
मायामय ही हे यानी मिथ्या ही है । शास्त्रविहित एवं लोकप्राप्त क्रियाओं को कर रहे या न कर रहे मुझे
इस संसार में कुछ भी अपेक्षित नहीं है, जो कि उपादेय हो । इसलिए यह शरीर उठकर पूर्व पूर्वं व्यवहार
के क्रम से प्राप्त प्रस्तुत कर्मो को करे । निर्व्यापार अंगवाला हो करके यह शरीर सूख जाता है, यह क्या
अच्छा है ? अर्थात् ऐसा करना उचित नहीं है । मन के निष्काम, राजहीन ओर शम होने पर शरीर के
अवयव से प्रारब्ध कर्मो द्वारा उत्पन्न हुए चेष्टा-अचेष्टारूप कार्य फल के लिए समान हैं अर्थात् उनसे
पुण्य-पापरूप फल का उदय नहीं होता