Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verses 11–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
कियन्मात्रमिदं नाम राज्यं सुखमिति स्थितम् ।
न प्रयोजनमेतेन ममेह क्षणभङ्गिना ॥ ११ ॥
सर्वमेव परित्यज्य मिथ्याशम्बरडम्बरम् ।
एकान्त एव तिष्ठामि संशान्त इव वारिधिः ॥ १२ ॥
अलमेभिरसत्प्रायैर्मम भोगविजृम्भितैः ।
त्यक्त्वा सर्वाणि कर्माणि सुखं तिष्ठामि केवलम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
सुखकररूप से स्थित यह राज्य कितना है ?
यानी कुछ भी नहीं है । क्षणमात्र में नष्ट होनेवाले इस राज्य से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है । मिथ्याभूत
माया के सभी आडम्बर का परित्याग करके प्रशान्त समुद्र की भाँति शान्त होकर मैं एकान्तमें ही स्थित
रहता हू । इन असत्य भोगविस्तारों से मेरा कोई प्रयोजन नहीं हे । सभी कर्मो का परित्याग कर मैं केवल
सुख से स्थित होता हूँ