Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verses 21–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, verses 21–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
किमुपादेयमस्तीह यत्नात्संसाधयाम्यहम् ।
कस्मिन्वस्तुनि बध्नामि धृतिं नाशविवर्जिते ॥ २१ ॥
किं मे क्रियापरतया किं मे निष्क्रिययापि वा ।
न तदस्ति विनाशेन वर्जितं यत्किलोदितम् ॥ २२ ॥
क्रियावानक्रियो वास्तु कायोऽयमसदुत्थितः ।
समस्थितस्य शुद्धस्य चितः का नाम मे क्षतिः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस संसार में क्या उपादेय हे, जिसको मैं प्रयत्न से सिद्ध करू । नाशरहित ऐसी कौन
वस्तु है, जिसमें मैं आस्था बाँधूं ? मेरी क्रियातत्परता से क्या एवं मेरी निष्क्रियत से ही क्या ? ? ऐसा कोई
कार्य नहीं है जो उत्पन्न हुआ हो, पर विनाशरहित हो; क्योकि जन्यवस्तुमात्र विनाशी है, ऐसा नियम
हे । असत्यभूत उत्पन्न हुआ यह शरीर क्रियायुक्त रहे या क्रियारहित रहे, देह के चलन ओर अचलन
दशा में समानरूप से स्थित, विशुद्ध, चिन्मात्र स्वभाव मेरी क्या क्षति हे ?