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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 48

सैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तालीसवाँ सर्ग भोग आदि की लालसा की निन्दा, दाशूर की उत्पत्ति और प्रसन्न हुए अग्निदेव से उनको वर प्राप्ति |

29 verse-groups

  1. Verse 1यदि यह संसार वक्र एकमात्र मन की कल्पना ही है, परमार्थतः यह ब्रह्म ही है; तो बुद्धि, प्रति…
  2. Verse 2तब कौन देखते हैं, ऐसी आकांक्षा होने पर कहते है । जो पुरुष विवेकबुद्धि की चरम सीमा को पहुँ…
  3. Verses 3–4जो विचारवान जीव इस जगत की बाह्य माया ओर अहंकारमयी आभ्यन्तर माया को तुच्छ जानकर जैसे साँप…
  4. Verse 5किन्तु अज्ञानी पुरुष आधि-व्याधि से धिरे हुए, प्रातःकाल या आज नष्ट होनेवाले शरीर के हित के…
  5. Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, आप भी अज्ञानियों की तरह जड़ शरीर के हित का दुःख के लिए सम्पादन न कीजि…
  6. Verse 7पहले प्रस्तुत दाशूर की आख्यायिका को सुनने की इच्छावाले श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं : हे प्र…
  7. Verse 8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जगत की माया के स्वरूप के उदाहरण रूप से मेरे द्व…
  8. Verses 9–16इस पृथिवी तल में विचित्र फूलों के वृक्षों से परिपूर्ण मगध नाम से प्रसिद्ध बड़ा समृद्ध देश…
  9. Verse 17श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन, वे महातपस्वी वन में कदम्ब के विशालवृक्ष की चोटी पर किसक…
  10. Verse 18श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, शरलोमा नाम से विख्यात उनके पिता थे, वे दूसरे ब्…
  11. Verse 19देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच की तरह उनके यह एक पुत्र हुआ | उस पुत्र के साथ उन्होंने वन मे…
  12. Verse 20तदुपरान्त वे शरलोमा ऋषि यहाँ पर अनेक वर्षो का उपभोग करके जैसे पक्षी घोंसला छोड कर चला जात…
  13. Verse 21दुर्भाग्य द्वारा दाशूर के पिता दाशूर से पृथक्‌ किये गये थे, अतएव एकाकी (>) वे कुरर पक्षी…
  14. Verses 22–23माता और पिता के वियोग से शोक सन्तप्त वे हेमन्त मेँ कमल के समान अत्यन्त म्लान हो गये । हे…
  15. Verse 24“हे ऋषिपुत्र, हे महाप्राज्ञ, तुम अज्ञानी के समान क्यों रोते हो, तुम संसार के चंचल स्वरूप…
  16. Verse 25हे सज्जन, संसार में चंचल सृष्टि सदा ऐसी ही है, वह पहले तो उत्पन्न होती है, जीवित रहती है…
  17. Verses 26–27हे मुने, व्यवहार दृष्टि में ब्रह्मा आदि यह जो कुछ भी वस्तु प्रसिद्ध है, उसका अवश्य विनाश…
  18. Verse 28दाशूर के नेत्र मारे विलाप के लाल हो गये थे, वे एसी आकाशवाणी सुनकर जैसे मोर मेघ का गर्जन स…
  19. Verse 29उठ कर अपने पिता का ओर्ध्वदेहिक कर्म बड़ी आतुरता के साथ करके उत्तम सिद्धि प्राप्त करने के…
  20. Verses 30–32वन में ब्रह्मोचित कर्म से तपस्या कर रहे उन्होने अनन्त शुद्धि- अशुद्धि आदि कल्पनाओं से युक…
  21. Verse 33तदनन्तर अपनी कल्पना से ही उन्होने विचार किया कि वृक्ष की चोटी ही पवित्र है, उसी पर मेरा र…
  22. Verse 34इसलिए अब मैं तपस्या करूँगा, जिस तपस्या से वृक्षों, शाखाओं ओर पत्तों पर पक्षियों की तरह रह…
  23. Verse 35ऐसा विचार कर खूब धधकती हुई आग जलाकर उसमें अपने कन्धों से नोच नोच कर मांस की आहुति देने लगे
  24. Verses 36–38तदुपरान्त मैं देवताओं का मुख हूँ, इसलिए देवताओं के कण्ठ ब्राह्मणके मांस से भस्म न हो, ऐसा…
  25. Verse 39हे सज्जन, जैसे कोश के भीतर से कोशाधिपति पहले से स्थापित मणि को ग्रहण करता है वैसे ही हे क…
  26. Verse 40भगवन्‌, प्राणियों से चारों ओर ठसाठस भरी हुई पृथिवी पर पवित्र प्रदेश मुझे कहीं नहीं दिखाई…
  27. Verse 41मुनिपुत्र के एेसा कहने पर सब देवताओं के मुखरूप अग्निदेव (वृक्षों के ऊपर ही तुम्हारी स्थित…
  28. Verse 42सायंकालीन कमल के समान अग्निदेव के क्षण भर में अन्तर्हित होने पर पूर्णकाम वह मुनिकुमार पूर…
  29. Verse 43अत्यन्त सन्तोष को प्राप्त हुए उस मुनिकुमार ने अभीष्ट वर की प्राप्ति द्वारा उत्पन्न हुई मु…