Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
इत्युक्तवन्तमनलमर्घपुष्पेण शोभिना ।
संपूज्य स्तुतिवादेन प्राह विप्रकुमारकः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सज्जन, जैसे कोश के भीतर से कोशाधिपति पहले से स्थापित मणि
को ग्रहण करता है वैसे ही हे कुमार, तुम्हारे अन्दर पहले से विद्यमान अभीष्ट वर तुम ग्रहण करो ।-
ऐसा धीर वचन उन्होने कहा । ।३८॥ जब अग्निदेव ने ऐसा कहा, तब ब्राह्मणकुमार ने अर्ध्य और
पुष्प से सुशोभित स्तुतियों द्वारा अग्नि की पूजा कर उनसे कहा