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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verses 9–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, verses 9–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 9-16

संस्कृत श्लोक

अस्त्यस्मिन्वसुधापीठे विचित्रकुसुमद्रुमः । मागधो नाम विख्यातः श्रीमाञ्जनपदो महान् ॥ ९ ॥ कदम्बवनविस्तारलीलावलितजङ्गलः । विचित्रविहगव्यूहसर्वाश्चर्यमनोहरः ॥ १० ॥ सस्यसंकटसीमान्तः पुरोपवनमण्डितः । कमलोत्पलकह्लारपूर्णसर्वसरित्तटः ॥ ११ ॥ उद्यानदोलाविलसल्ललनागेयघुंघुमः । निशोपभुक्तकुसुमनीरन्ध्रविशिखावनिः ॥ १२ ॥ तत्रैकस्मिन्गिरितटे कर्णिकारसमाकुले । कदलीखण्डनीरन्ध्रनीपगुल्मविराजिते ॥ १३ ॥ पुष्पौघस्फूर्जदनिले केसरारुणधूलिनि । कारण्डवकृतारावे रसत्सरससारसे ॥ १४ ॥ तस्मिन्नगवरे पुण्ये विचित्रविहगद्रुमे । कश्चित्परमधर्मात्मा मुनिरासीन्महातपाः ॥ १५ ॥ दाशूरनामा महता तपोयोगेन संयुतः । कदम्बपृष्ठवास्तव्यो वीतरागो महामतिः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस पृथिवी तल में विचित्र फूलों के वृक्षों से परिपूर्ण मगध नाम से प्रसिद्ध बड़ा समृद्ध देश है, उसमें कदम्ब वन के विस्तार ने अनायास सब जंगलों को वेष्टित कर रक्खा हे । भाँति-भाँति के पक्षियों के झुण्डों और आश्चर्यमय वस्तुओं से वह बड़ा रमणीय हे । उसकी ग्राम सीमा की भूमिर्यो धान आदि की खेती से व्याप्त हैं नगर के उपवनं से वह सुशोभित है उसकी सब नदियों के तट कमल, उत्पल ओर कहलार से भरें है । उपवनों के झूलों में झूल रही महिलाओं के गानों से वह गुलजार हे । निशा से उपभुक्त हुए-से मूर्झाए फूलों से वहाँ की सड़कें निबिड रहती हैं । उस देश में कनौल के वृक्षों से व्याप्त, केले की झाड़ियों से निबिड, कदम्बं के वृक्षों से सुशोभित एक पर्वत तट था, जहाँ फूलों में बहने से वायु शब्द करता था, केसररूपी लालधूलि से जो व्याप्त था, जिस पर कलहंस तथा अनुरागयुक्त सारस शब्द करते थे। उस पुण्य पर्वत पर, जिसमें विचित्र पक्षी और वृक्ष थे, परम धर्मात्मा ओर महातपस्वी कोई मुनि निवास करते थे। उनका नाम दाशूर था । वे अत्यन्त कठिन तपस्या कर रहे थे । कदम्ब वृक्ष की चोटी पर वे रहते थे। उन्हे संसार की किसी वस्तु से अनुराग न था और वे महाज्ञानी थे