Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verses 30–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 30-32
संस्कृत श्लोक
ब्राह्मेण कर्मणा तस्य विपिने चरतस्तपः ।
अनन्तसंकल्पमयं श्रोत्रियत्वं बभूव ह ॥ ३० ॥
अज्ञातज्ञेयबुद्धेस्तु श्रोत्रियस्य तया तया ।
न विशश्राम चेतोऽस्य पवित्रेऽपि धरातले ॥ ३१ ॥
केवलं सर्वमेवेदमपि शुद्धं धरातलम् ।
अशुद्धमिव पश्यन्स न रेमे क्वचिदेव हि ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
वन में ब्रह्मोचित कर्म से तपस्या कर रहे उन्होने अनन्त शुद्धि-
अशुद्धि आदि कल्पनाओं से युक्त श्रोत्रियत्व प्राप्त किया, जिससे ज्ञेय तत्त्व का ज्ञान नहीं हुआ, ऐसी
बुद्धिवाले उस श्रोत्रिय का चित्त उन-उन शुद्धि ओर अशुद्धि की कल्पनाओं से इस पवित्र पृथिवी पर
विश्राम को प्राप्त नहीं हुआ | यद्यपि यह सारा भूमण्डल शुद्ध था, तथापि इसे केवल अशुद्ध सा देखते
हुए वे कहीं पर विश्रान्ति को प्राप्त नहीं हए