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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

तुच्छां तां जागतीं मायां दृष्ट्वा जीवो विचारवान् । अहंकारमयीं मायां त्यजत्यहिरिव त्वचम् ॥ ३ ॥ असक्ततां ततोऽभ्येत्य पुना राम न जायते । क्षेत्रेष्वपि चिरं तिष्ठन्बीजं दग्धमिवाग्निना ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो विचारवान जीव इस जगत की बाह्य माया ओर अहंकारमयी आभ्यन्तर माया को तुच्छ जानकर जैसे साँप केचुल को छोड देता है वैसे ही माया का त्याग करता है तदनन्तर अनासक्ति को प्राप्त होकर जैसे अग्नि से जला हुआ बीज चिरकाल तक खेतों में रहता हुआ भी उत्पन्न नहीं होता वैसे ही वह भी चिरकाल तक देहो में स्थित होता हुआ भी फिर उत्पन्न नहीं होता