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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verses 36–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

अथ गीर्वाणवृन्दस्य समग्रा गलभित्तयः । मन्मुखत्वेन मा यान्तु विप्रमांसेन भस्मताम् ॥ ३६ ॥ इति संचिन्त्य भगवान्सप्तार्चिस्तस्य देवता । पुरो बभूव दीप्तांशुर्दीप्तांशुर्वाक्पतेरिव ॥ ३७ ॥ उवाच वचनं धीरं कुमाराभिमतं वरम् । गृहाण स्थापितं साधो कोशाकाशान्मणिं यथा ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त मैं देवताओं का मुख हूँ, इसलिए देवताओं के कण्ठ ब्राह्मणके मांस से भस्म न हो, ऐसा विचार कर दैदीप्यमान भगवान अग्निदेव उनके सामने, जैसे बृहस्पति के सामने सूर्य, प्रकट हुए