Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 1
16 verse-groups
- Verses 1–14चित्र वायु, सूर्य और मनुष्यों के थोडे से आघात से सूख रहे कोमल पत्तों से रचित जलमय निःसार…
- Verses 15–16नेत्र रोग से (रतौंधी से) देखे गये अन्धकार के चक्र के तुल्य जिसका रूप अत्यन्त असम्भावित है…
- Verse 17कुहरे के समान यह विस्तार युक्त है ओर गृहीत होने पर कुछ भी नहीं हे । सांख्यवादियों ने केवल…
- Verse 18बाह्य जगत में उक्त न्यायको आध्यात्मिक जगत में भी दिखाते हुए कहते है । मैं किंचित् भूतमय…
- Verses 19–20यदि ऐसा है, तो जगत स्वतः तो सत्ता शून्य है, ब्रह्मसत्तासे जगत का कोई स्पर्श नहीं है, ऐसी…
- Verse 21भगवन्, प्रलय में अपनी सत्ता से कारण में जगत है, इस प्रकार के बोधवाले कपिल आदि क्या अज्ञा…
- Verse 22आगे कही जाने वाली मेरी युक्तियों को सुनिये । उत्पत्ति के पहले कारण में कार्य है ऐसा जो कह…
- Verse 23बीज में अंकुर के समान प्रलय में जगत है, यह दृष्टान्त विषम है; क्योकि कूटस्थचिदेकरस आत्मा…
- Verses 24–25स्वयं दृश्य बीज चित्तादि इंद्रियों का गोचर है, इसलिए तुषसहित जवादि धान्यों में अंकुर आदि…
- Verse 26आकाश से भी सूक्ष्म सम्पूर्ण नामों से रहित परमात्मामें बीजता कैसी और कैसे हो सकती है ?
- Verses 27–28इस प्रकार तत्त्वदृष्टि से बीजत्व का परमात्मा मे असम्भव कहते हैं। वस्तुतः सदेकरस भी वह सूक…
- Verses 29–30जो वस्तु कुछ भी नहीं है, उस वस्तु में कुछ भी कैसे रह सकता है ? यदि है तो वहाँ पर रहती हुई…
- Verse 31चिदेकरससत्ता जड़ अनेकरससत्ता की विरोधिनी है, इसलिए भी चिदेकरससत्ता में जगतसत्ता की सम्भाव…
- Verse 32भले ही भेद से परमात्मा में जगत की स्थिति न हो, उसके साथ अभेद से तो उसकी स्थिति होगी ही, ऐ…
- Verse 33में अंकुर है, यह बात तो युक्ति-युक्त हे, लेकिन आकार रहित परमात्मा में यह विशालकाय जगत हे,…
- Verses 34–36यहाँ पर यह विचार करना चाहिये कि साख्यवादियो ने कारण में जगत की सत्ता की जो कल्पना कर रक्ख…