Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
महाकल्पक्षये दृश्यमास्ते बीज इवाङ्कुरः ।
परे भूय उदेत्येतत्तत एवेति किं वद ॥ १९ ॥
एवं बोधाः किमज्ञाः स्युरुत ज्ञा इति च स्फुटम् ।
यथावद्भगवन्ब्रूहि सर्वसंशयशान्तये ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो जगत स्वतः तो सत्ता शून्य है, ब्रह्मसत्तासे जगत का कोई स्पर्श नहीं है, ऐसी
अवस्था में “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" इत्यादि सत्कार्यवाही श्रुतिर्यो का ओर उक्त श्रुतियो के अनुसारी
व्यास, कपिल आदि के सूत्रों का सामंजस्य कैसे होगा ?
ऐसा समझते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हे : हे भगवन्, बीज में अंकुर के समान महाप्रलय होने पर दृश्य
पर (ब्रह्म) में रहता है, फिर उसीसे यह उत्पन्न होता हे, इस प्रकार जो व्यास आदि ने कहा है, उसकी
संगति केसे होगी, यह आप कृपाकर मुझसे कहिये