Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
स्फुरितेक्षणदृष्टान्धकारचक्रकवर्तनम् ।
अत्यन्तमभवद्रूपमपि प्रत्यक्षवत्स्थितम् ॥ १५ ॥
वार्बुद्बुदमिवाभोगि शून्यमन्तःस्फुरद्वपुः ।
रसात्मकं चाप्यरसमविच्छिन्नक्षयोदयम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
नेत्र रोग से (रतौंधी से) देखे गये अन्धकार के चक्र के तुल्य जिसका रूप
अत्यन्त असम्भावित है, ऐसा यह जगत्रूपी चित्र प्रत्यक्ष के तुल्य स्थित है । जल के बुद्बुदों के समान
इसने अपने आकार की कल्पना कर रक्खी हे । भीतर में यह शून्य है । इसका स्वरूप देदीप्यमान हे ।
आपाततः रमणीय होता हुआ भी परिणाम में अत्यन्त कटु है इसके जन्म ओर मरण अविच्छिन्न
हैं