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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

बीजं भवेत्स्वयं दृश्यं चित्तादीन्द्रियगोचरम् । यवधानादिधान्यानि युक्तः पत्राङ्कुरोद्भवः ॥ २४ ॥ मनःषष्ठेन्द्रियातीतं यत्स्यादतितरामणु । बीजं तद्भवितुं शक्तं स्वयंभूर्जगतां कथम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वयं दृश्य बीज चित्तादि इंद्रियों का गोचर है, इसलिए तुषसहित जवादि धान्यों में अंकुर आदि की उत्पत्ति उचित है। जो स्वयम्भू पदार्थ पाँच इंद्रियों और छठे मन का अगोचर है और अत्यन्त अणु है, वह जगतों का बीज होने में कैसे समर्थ हो सकता है। भाव यह है कि जिसमें बीजत्व ही दुर्घट हो, उसमें जगतकी स्वसत्ता से स्थिति तो बहुत दूर की बात ठहरी