Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 1, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
श्रृण्वेतत्किमसंबन्धं कथमेतदवास्तवम् ।
विपरीतो बोध एष वक्तुः श्रोतुश्च मोहकृत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
आगे कही जाने वाली मेरी युक्तियों को सुनिये । उत्पत्ति के
पहले कारण में कार्य है ऐसा जो कहता है, उससे पूछना चाहिये कि वह सामान्यसत्ता से है अथवा बीजादि
की सत्ता से है या अंकुरादिकी सत्ता से है ? प्रथम पक्ष में उस अंकुरादिका किससे सम्बन्ध नहीं होगा ।
यानि सामान्यसत्ता सर्ववस्तु साधारण है, इसलिए उत्पन्न होनेवाले अंकुर आदि का सब वस्तुओं से सम्बन्ध
प्राप्त हो जायेगा । यदि कहो, हमें दृष्टापत्ति है, तो खेत में अथवा अंकुरित बीज में देखा गया ही अंकुरादि
वास्तविक हे और कोठिला में रक्खे गये बीज में अथवा पत्थर के टुकड़े में यह अवास्तविक है, यह कैसे
होगा ? दूसरे पक्ष में भी बीज सत्ता से अंकुरसम्बन्धका ओर घट, पटादि के सम्बन्ध का स्वरूपतः
विलक्षणता का निरूपण न होने से जिसके साथ बीजका सम्बन्ध न हो ऐसी कोन सी वस्तु न होगी यानी
धान आदि के बीज में सम्पूर्णं जगत की सत्ता प्राप्त होगी । यदि कहिये, इष्टापत्ति है, तो अंकुरित बीज
में अंकुर आदि ही वास्तविक हे; घट, पट आदि वास्तविक नहीं हैं, यह कैसे होगा ? तीसरे पक्ष में अंकुर
की स्वरूपसत्ता से बीजसम्बन्ध का और घट आदि के सम्बन्ध का भेदनिरुपण न होने से जिसके साथ
अंकुरसत्ता का सम्बन्ध न हो, ऐसी कौन वस्तु होगी अर्थात् सर्वत्र अंकुर के सद्भाव का प्रसंग होगा, यदि
इष्टापत्ति मानिये, तो बीज आदि में अंकुर आदि वास्तविक हैं अन्यत्र नहीं हैं, यह कैसे होगा दूसरी बात
यह भी है कि साधारण सत्ता से असाधारण अंकुर आदि है, कारण सत्ता से कार्य है और कार्यसत्ता से कारण
है। इन तीनों पक्षों मं भी पूर्वोक्त उक्तिका सम्भव नहीं घटता, इसलिए यह बोध विपरीत ही है। यह श्रोता
और वक्ता दोनों को मोह में डालनेवाला है