Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 93
16 verse-groups
- Verse 1अनुसन्धान का अनुसरण करनेवाला मन आकाश में भी महावन को देखकर उसको काटता है और काटकर फिर उसम…
- Verse 2अव्याकृत नामरूपवाले उस ब्रह्म से चारों ओर से अतिसूक्ष्म होनेके कारण नामसम्बन्ध के अयोग्य…
- Verse 3उक्त मन तन्मात्ररूप सूक्ष्म भूतों की कल्पनापूर्वक स्वाप्न शरीर के समान वासनामय पुरुष का आ…
- Verses 4–5इसलिए हे श्रीरामजी, जो यह परमेष्ठी (ब्रह्मा) है, उसीको आप मनरूप तत्त्व जानिए । मनरूप तत्त…
- Verses 6–8यदि कोई शंका करे कि उनके संकल्प से जगत् की उत्पत्ति भले ही हो, पर जीवों का उसमें अभिमान…
- Verse 9रहा, इस आशय से कहते हैं। इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे समुद्र से तरंगों की उत्पत्ति होती…
- Verse 10जो अन्य (व्यष्टिअहंकारोपाधि से उपहित) चिदाभास हैं, वे सब सर्वशक्तिमान् ब्रह्म से अभिन्न…
- Verses 11–12जब यह जगत् विस्तार को प्राप्त होता है तब वे ही पितामहरूप (ब्रह्मारूप) मन से सर्वप्रथम उल…
- Verse 13वे चिदाकाश से ही उत्पन्न होकर मायाकाश में तन्मात्रोपाधियों के (भूतमात्रोपाधियों के) साथ म…
- Verse 14तदुपरान्त योनि से जगत् में उत्पन्न होते हैँ । तदनन्तर काकतालीयन्याय के सम्बन्ध से उत्पन्…
- Verse 15तदनन्तर शुभ ओर अशुभ वासनाओं से युक्त पुण्य-पाप कर्मरूपी रस्सियों से जिनका लिंग शरीर बंधा…
- Verse 16कर्म और कर्मो की वासना में इच्छा ही कारण है, इसलिए सब जीव काममय ही हैं, ऐसा कहते हैं। ये…
- Verse 17कोई जीव जिनको हजारों वर्षो के बाद तत्त्वज्ञान होनेवाला है, कर्मरूपी बकँडर से भ्रान्त होकर…
- Verses 18–19कोई जीव, जो कि चित्सत्ता के अज्ञान से मोहित रहते है, अतएव असंख्य जन्मवाले हैं, चिरकाल से…
- Verses 20–23जैसे वायु से उड़ाये गये समुद्र के बिन्दु समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही जिन्होंने तत…
- Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, इस संसाररूपी जंगल की जीर्ण-शीर्ण लताका विक्षुब्ध मन ही शरीर है। यदि य…