Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
अप्रमेयभवाः काश्चिच्चित्सत्ताज्ञानमोहिताः ।
चिरजाता भवन्तीह बहुकल्पशतान्यपि ॥ १८ ॥
काश्चित्कतिपयातीता मनोरमभवान्तराः ।
विहरन्ति जगत्यस्मिन्शुभकर्मपरायणाः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई जीव, जो कि चित्सत्ता
के अज्ञान से मोहित रहते है, अतएव असंख्य जन्मवाले हैं, चिरकाल से जन्म लेकर इस
संसार में सैकड़ों कल्पो तक उत्पन्न होते हैँ । कोई जीव जिनके कुछ अमनोहर जन्मान्तर बीत
चुके हैं और जो इस समय शुभ कर्मोमिं तत्पर होकर इस जगत् में विहार कर रहे हैं, वे थोड़े ही
जन्मों में मुक्त हो जायेंगे