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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

जगति स्फारतां नीते पितामहरूपेण मनसा समुल्लसन्ति ॥ ११ ॥ एते सहस्रशोऽपि परिवर्तमानजीवा उच्यन्ते ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जब यह जगत्‌ विस्तार को प्राप्त होता है तब वे ही पितामहरूप (ब्रह्मारूप) मन से सर्वप्रथम उल्लास को प्राप्त होते हैँ, वे ही सब पृथक्‌ पृथक्‌ चिदाभाव उपाधि की असंख्यता से असंख्य ओर संसरणशील जीव कहे जाते हैं